कबीरधाम/कवर्धा (छत्तीसगढ़), 2 मार्च 2026।
फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि पर आज जिलेभर में होलिका दहन का आयोजन श्रद्धा और उत्साह के साथ किया जाएगा। बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह पर्व सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारे और नई ऊर्जा का संदेश देता है। शाम होते ही शहर और ग्रामीण अंचलों में निर्धारित स्थलों पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर होलिका दहन किया जाएगा।

पौराणिक मान्यता और धार्मिक महत्व

होलिका दहन की कथा भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी है। मान्यता है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, लेकिन जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी तो स्वयं जल गई और भक्त प्रह्लाद सुरक्षित रहे। यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि सत्य और भक्ति की सदैव विजय होती है।

शुभ मुहूर्त और तैयारियां

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार पूर्णिमा तिथि में भद्रा काल के समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन का शुभ समय माना जाता है। इसी मुहूर्त में श्रद्धालु होलिका की परिक्रमा कर नारियल, गेहूं की बालियां और नई फसल अर्पित करेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में नई फसल की बालियां भूनकर प्रसाद के रूप में वितरित करने की परंपरा भी निभाई जाएगी।

बाजारों में रौनक, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम

होलिका दहन और रंगोत्सव को लेकर बाजारों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। पूजा सामग्री, लकड़ी, उपले, रंग-गुलाल और पिचकारियों की दुकानों पर भीड़ उमड़ रही है।

त्योहार को शांतिपूर्ण और सुरक्षित ढंग से संपन्न कराने के लिए पुलिस प्रशासन ने विशेष तैयारियां की हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में पेट्रोलिंग बढ़ाई गई है तथा असामाजिक तत्वों पर कड़ी नजर रखी जा रही है।

पर्यावरण संरक्षण की अपील

प्रशासन और सामाजिक संगठनों ने लोगों से अपील की है कि होलिका दहन में हरे-भरे पेड़ों की कटाई न करें और प्लास्टिक अथवा रबर जैसी हानिकारक वस्तुएं अग्नि में न डालें। पर्यावरण अनुकूल सामग्री का उपयोग कर स्वच्छ और सुरक्षित होली मनाने का संदेश दिया गया है।

सामाजिक एकता का संदेश

होलिका दहन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला पर्व भी है। मोहल्लों और गांवों में लोग मिलजुलकर होलिका सजाते हैं, सामूहिक पूजा करते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।

खबरी बाबु न्यूज़ चैनल जिलेवासियों से अपील करती है कि वे आपसी प्रेम, सौहार्द और शांति बनाए रखते हुए इस पावन पर्व को उल्लासपूर्वक मनाएं और 4 मार्च को रंगोत्सव के दिन भी मर्यादा एवं सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें।

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