मनरेगा में नियम ताक पर? बिना कार्यक्रम अधिकारी के सहायक प्रोग्रामर को सौंपा प्रभार, जिला पंचायत के आदेशों पर उठे गंभीर सवाल

2018 के शासन निर्देश और 2025 के जिला पंचायत आदेश में विरोधाभास, प्रशासनिक वैधता व वित्तीय पारदर्शिता पर उठे सवाल

कवर्धा (सहसपुर  लोहारा)। कबीरधाम जिला पंचायत में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के संचालन को लेकर एक बार फिर गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़े हो गए हैं। सामने आए दो अलग-अलग आधिकारिक दस्तावेजों ने जिला पंचायत की कार्यप्रणाली, नियमों के पालन और प्रशासनिक निर्णयों की वैधता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक ओर राज्य स्तर से जारी निर्देश सहायक प्रोग्रामर की भूमिका और जवाबदेही को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं, वहीं दूसरी ओर जिला पंचायत द्वारा जारी आदेश में उसी सहायक प्रोग्रामर को कार्यक्रम अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया।

यह मामला केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था का नहीं, बल्कि मनरेगा जैसे संवेदनशील और करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन से संचालित विभाग में नियमों की अनदेखी, जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर विषय बन गया है।

2018 के शासन निर्देश में तय की गई थी स्पष्ट जिम्मेदारी

राज्य नरेगा प्रकोष्ठ, रायपुर द्वारा वर्ष 2018 में जारी पत्र क्रमांक 4644/वि-7/MGNREGA/2018 में सहायक प्रोग्रामर की जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया था। पत्र के अनुसार यदि किसी कार्य में स्वीकृत राशि से अधिक व्यय होता है तो संबंधित कार्यक्रम अधिकारी के साथ-साथ सहायक प्रोग्रामर भी वित्तीय अनियमितता के लिए समान रूप से उत्तरदायी होंगे।

निर्देशों में यह भी कहा गया था कि डेटा एंट्री के बाद सहायक प्रोग्रामर की जिम्मेदारी होगी कि वह स्वीकृत प्राक्कलन के अनुरूप व्यय की जांच करे तथा किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर तत्काल संबंधित अधिकारियों को अवगत कराए। यदि इस प्रक्रिया में लापरवाही बरती जाती है तो संबंधित कर्मचारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

स्पष्ट है कि शासन ने सहायक प्रोग्रामर की भूमिका तकनीकी निगरानी, डेटा सत्यापन और वित्तीय नियंत्रण तक सीमित रखी थी।

2025 के आदेश ने खड़े कर दिए नए सवाल

इसी बीच जिला पंचायत कबीरधाम द्वारा 22 दिसंबर 2025 को जारी एक आदेश ने पूरे मामले को विवादों के केंद्र में ला दिया। आदेश में जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा में कार्यक्रम अधिकारी के कार्यों के सुचारू संचालन के लिए सहायक प्रोग्रामर दिलीप कुमार साहू को कार्यक्रम अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि जिस पद की भूमिका तकनीकी सहायता और निगरानी तक सीमित है, उसी अधिकारी को प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकारों से युक्त कार्यक्रम अधिकारी का दायित्व किस नियम के तहत सौंपा गया?

यदि शासन ने सहायक प्रोग्रामर की जिम्मेदारियां अलग से निर्धारित की हैं, तो क्या जिला स्तर पर उन्हें प्रशासनिक प्रभार देना नियमों की भावना के अनुरूप माना जा सकता है? यही प्रश्न अब पूरे मामले का केंद्र बन गया है।

हितों के टकराव की आशंका

मनरेगा विशेषज्ञों और विभागीय सूत्रों का मानना है कि कार्यक्रम अधिकारी का पद केवल तकनीकी नहीं बल्कि प्रशासनिक और वित्तीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इसी स्तर पर कार्यों की स्वीकृति, भुगतान प्रक्रिया, योजनाओं की निगरानी, प्रशासनिक निर्णय तथा विभिन्न स्तरों पर जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है।

ऐसी स्थिति में यदि तकनीकी पद पर कार्यरत कर्मचारी को ही प्रशासनिक अधिकार भी सौंप दिए जाएं, तो निगरानी और निर्णय लेने की दोनों भूमिकाएं एक ही व्यक्ति के पास आ जाती हैं। इससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) की संभावना बढ़ जाती है तथा वित्तीय पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है।

नियमों से अलग व्यवस्था क्यों?

जानकारों का कहना है कि यदि किसी कारणवश कार्यक्रम अधिकारी का पद रिक्त था या नियमित अधिकारी उपलब्ध नहीं था, तब भी प्रशासनिक व्यवस्था बनाने के लिए शासन के निर्धारित नियमों और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति आवश्यक होती है।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि—

* क्या सहायक प्रोग्रामर को कार्यक्रम अधिकारी का प्रभार देने के लिए शासन से अनुमति ली गई थी?

* क्या मनरेगा संचालन दिशा-निर्देशों में ऐसी व्यवस्था का कोई स्पष्ट प्रावधान है?

* यदि नहीं, तो जिला पंचायत ने किस आधार पर यह आदेश जारी किया?

इन सवालों का जवाब अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

पहले भी उठ चुके हैं मनरेगा पर सवाल

गौरतलब है कि कबीरधाम जिले में मनरेगा के क्रियान्वयन को लेकर समय-समय पर भुगतान संबंधी अनियमितताओं, प्रशासनिक लापरवाही और नियमों के उल्लंघन के आरोप सामने आते रहे हैं। ऐसे में यह नया मामला विभागीय कार्यप्रणाली पर एक और गंभीर प्रश्न खड़ा कर रहा है।

प्रशासनिक पारदर्शिता पर उठी बहस

सामने आए दोनों दस्तावेजों की तुलना करने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि एक ओर शासन सहायक प्रोग्रामर की जवाबदेही तय कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जिला स्तर पर उसी पदाधिकारी को कार्यक्रम अधिकारी का प्रभार देकर उसकी भूमिका का विस्तार कर दिया गया।

इस विरोधाभास ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना का संचालन निर्धारित नियमों के अनुरूप हो रहा है या फिर प्रशासनिक सुविधानुसार व्यवस्था बनाई जा रही है।

अब प्रशासन से जवाब की अपेक्षा

इस पूरे मामले में जिला प्रशासन और जिला पंचायत से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करें—

* सहायक प्रोग्रामर को कार्यक्रम अधिकारी का प्रभार किन नियमों और परिस्थितियों में दिया गया?

* क्या यह निर्णय शासन के दिशा-निर्देशों के अनुरूप था?

* यदि नियमों से अलग व्यवस्था बनाई गई, तो उसकी वैधानिक स्वीकृति किस स्तर से प्राप्त हुई?

इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह निर्णय प्रशासनिक आवश्यकता के तहत लिया गया था या फिर वास्तव में मनरेगा संचालन में नियमों की अनदेखी की गई।

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