छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों की फीस में बढ़ोतरी से अभिभावकों की चिंता बढ़ी,शिक्षा सत्र 2026-27 से लागू होंगे नए शुल्क, हाई स्कूल में ₹90 और हायर सेकेंडरी में ₹105 की वृद्धि,पढ़े पुरा समाचार…?
रायपुर- छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के सरकारी स्कूलों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं के लिए नई शुल्क व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार आगामी शिक्षा सत्र 2026-27 से हाई स्कूल एवं हायर सेकेंडरी स्कूलों की स्थानीय शुल्क (लोकल फीस) में बढ़ोतरी की जाएगी। सरकार का कहना है कि स्कूलों में खेलकूद, प्रयोगशाला, सांस्कृतिक गतिविधियों तथा अन्य व्यवस्थाओं पर बढ़ते खर्च को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है।
हालांकि, सरकार के इस फैसले के बाद प्रदेशभर में अभिभावकों और छात्रों के बीच चिंता बढ़ गई है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र मध्यम और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। ऐसे में फीस वृद्धि को लेकर कई सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
शाला निधि के तहत बढ़ाई गई राशि
शिक्षा विभाग की ओर से जारी दिशा-निर्देश में बताया गया है कि स्कूलों में विभिन्न गतिविधियों के संचालन के लिए ‘शाला निधि’ के अंतर्गत शुल्क लिया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में खेल सामग्री, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, विज्ञान प्रयोगशाला, रखरखाव तथा अन्य शैक्षणिक गतिविधियों का खर्च लगातार बढ़ा है। इसी वजह से अलग-अलग मदों में ₹5 से ₹10 तक की वृद्धि की गई है।
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि यह राशि छात्रों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने और स्कूलों की गतिविधियों को व्यवस्थित रूप से संचालित करने में सहायक होगी।
नई शुल्क संरचना जारी
सरकार द्वारा जारी नई शुल्क सूची के अनुसार हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्तर पर फीस में निम्नानुसार बढ़ोतरी की गई है—
स्कूल स्तर पुरानी वार्षिक फीस नई वार्षिक फीस कुल वृद्धि
हाई स्कूल (कक्षा 9वीं-10वीं) ₹410 ₹500 ₹90
हायर सेकेंडरी (कक्षा 11वीं-12वीं) ₹445 ₹550 ₹105
नई व्यवस्था लागू होने के बाद अब विद्यार्थियों को पहले की तुलना में अधिक राशि जमा करनी होगी। शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि नई फीस आगामी शिक्षा सत्र से प्रभावी होगी।
गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर असर
फीस वृद्धि के इस फैसले का सबसे अधिक असर गरीब एवं निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी हैं जो सरकारी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करते हैं। कई अभिभावकों का कहना है कि पहले से ही किताबें, यूनिफॉर्म, परिवहन और अन्य खर्च बढ़ रहे हैं, ऐसे में फीस वृद्धि उनके लिए अतिरिक्त बोझ साबित होगी।
अभिभावकों का मानना है कि सरकारी स्कूलों का उद्देश्य सस्ती और सुलभ शिक्षा उपलब्ध कराना है। यदि धीरे-धीरे शुल्क में लगातार बढ़ोतरी होती रही तो गरीब परिवारों के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है।
राजनीतिक गलियारों में बढ़ी हलचल
फीस वृद्धि को लेकर प्रदेश की राजनीति भी गरमा गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार के फैसले का विरोध करते हुए इसे छात्र और अभिभावक विरोधी कदम बताया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकारी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं और उन पर अतिरिक्त शुल्क थोपना उचित नहीं है।
विपक्ष ने सरकार से निर्णय वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि शिक्षा को महंगा बनाने के बजाय सरकार को स्कूलों की सुविधाएं अपने बजट से मजबूत करनी चाहिए। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
शिक्षा विशेषज्ञों की राय
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है, लेकिन फीस वृद्धि का निर्णय लेते समय गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार यदि शुल्क बढ़ा रही है तो साथ ही जरूरतमंद छात्रों के लिए विशेष राहत या सहायता योजना भी शुरू करनी चाहिए।
सरकार की दलील
सरकारी सूत्रों के अनुसार फीस वृद्धि का उद्देश्य केवल स्कूलों की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना है। विभाग का कहना है कि लंबे समय बाद शुल्क में संशोधन किया गया है और यह बढ़ोतरी सीमित स्तर पर रखी गई है। अधिकारियों का दावा है कि इससे स्कूलों की गतिविधियों को सुचारु रूप से संचालित करने में मदद मिलेगी और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल सकेगा।
आने वाले दिनों में बढ़ सकता है विरोध
फीस वृद्धि के फैसले के बाद छात्र संगठनों और अभिभावक संघों की प्रतिक्रिया भी सामने आने लगी है। यदि सरकार इस निर्णय में बदलाव नहीं करती है तो आने वाले समय में विरोध प्रदर्शन और आंदोलन की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल पूरे प्रदेश में इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है।


