छत्तीसगढ़ विधानसभा से धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 पारित, धार्मिक स्वतंत्रता व पारदर्शिता पर जोर,DCM विजय शर्मा…
कवर्धा/रायपुर, 20 मार्च 2026। छत्तीसगढ़ विधानसभा में शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण विधायी निर्णय लेते हुए छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 को विस्तृत चर्चा और बहस के बाद पारित कर दिया गया। यह विधेयक उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा सदन में प्रस्तुत किया गया था, जिसे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन में तैयार किया गया है। सरकार ने इसे राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा और धर्मांतरण प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम बताया है।
विधेयक पर चर्चा के दौरान उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बदलते सामाजिक और कानूनी परिदृश्य को देखते हुए वर्ष 1968 से लागू प्रावधान अब पर्याप्त नहीं रह गए थे, जिसके चलते नए और सख्त कानून की आवश्यकता महसूस की गई।
📌 धर्मांतरण प्रक्रिया होगी पारदर्शी और नियंत्रित
नए विधेयक में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़े गए हैं। अब किसी भी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन से पूर्व प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करना होगा। इसके बाद निर्धारित समय सीमा में सूचना सार्वजनिक की जाएगी और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी। जांच पूर्ण होने के बाद ही धर्म परिवर्तन का प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि हर नागरिक को अपनी इच्छा से धर्म चुनने की स्वतंत्रता रहेगी, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाएगा कि यह निर्णय किसी दबाव, प्रलोभन या भय के कारण न लिया गया हो।
📌 संस्थाओं के लिए पंजीयन अनिवार्य, ग्राम सभा की भागीदारी
विधेयक के तहत धर्मांतरण कराने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए पंजीयन अनिवार्य कर दिया गया है। उन्हें हर वर्ष प्राधिकृत अधिकारी को विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। इसके साथ ही ग्राम सभा को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है, जिससे स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
विशेष रूप से यह भी स्पष्ट किया गया है कि विवाह को धर्मांतरण का आधार नहीं माना जाएगा। विवाह के बाद भी धर्म परिवर्तन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होगा।
⚖️ अवैध धर्मांतरण पर सख्त दंड का प्रावधान
विधेयक में अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए कड़े दंड निर्धारित किए गए हैं—
- सामान्य अवैध धर्मांतरण: 7 से 10 वर्ष कारावास और न्यूनतम 5 लाख रुपये जुर्माना
- महिला, अनुसूचित जाति/जनजाति, नाबालिग जैसे विशेष वर्गों के मामले में: 10 से 20 वर्ष कारावास और 10 लाख रुपये जुर्माना
- सामूहिक धर्मांतरण: 10 वर्ष से आजीवन कारावास और 25 लाख रुपये जुर्माना
- लोक सेवक द्वारा अपराध: 10 से 20 वर्ष कारावास
- धन के माध्यम से धर्मांतरण: 20 लाख रुपये तक जुर्माना
- भय या प्रलोभन से धर्मांतरण: 10 से 20 वर्ष कारावास और 30 लाख रुपये जुर्माना
पुनरावृत्ति की स्थिति में आरोपी को आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान किया गया है।
🛡️ पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति और न्याय की व्यवस्था
विधेयक में पीड़ितों के अधिकारों को विशेष महत्व दिया गया है। यदि किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन दबाव, धोखे या लालच के कारण हुआ पाया जाता है, तो उसे पीड़ित मानते हुए न्यायालय द्वारा क्षतिपूर्ति दिलाने का प्रावधान किया गया है। इससे पीड़ितों को न्याय मिलने के साथ-साथ ऐसे मामलों में कमी आने की उम्मीद जताई गई है।
साथ ही जांच प्रक्रिया को सुदृढ़ करते हुए यह तय किया गया है कि केवल उप निरीक्षक या उससे वरिष्ठ अधिकारी ही मामलों की जांच करेंगे। इन मामलों में प्रमाण का भार आरोपी पर होगा और सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय अधिसूचित किए जाएंगे।
🗣️ सरकार का दावा: सामाजिक समरसता होगी मजबूत
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने विश्वास जताया कि यह कानून राज्य में सामाजिक समरसता को मजबूत करेगा और धर्मांतरण से जुड़े विवादों में कमी लाएगा। उन्होंने कहा कि स्पष्ट और प्रभावी कानूनी व्यवस्था से अनावश्यक तनाव और संघर्ष की स्थितियों से बचा जा सकेगा।
सरकार का मानना है कि यह विधेयक पारंपरिक सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करते हुए नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को संतुलित तरीके से सुनिश्चित करेगा।
📍 निष्कर्ष:
छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 को राज्य की राजनीति और समाज के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। जहां एक ओर यह धार्मिक स्वतंत्रता के संरक्षण की बात करता है, वहीं दूसरी ओर अवैध धर्मांतरण पर सख्त नियंत्रण का संदेश भी देता है। आने वाले समय में इसके प्रभावों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

