केशदा-इकनामा-चेलिकमा लौह अयस्क खनन प्रस्ताव का विरोध तेज,स.लोहारा रियासत के राजा खड़गराज सिंह ने कलेक्टर को सौंपा आवेदन,पढ़े पुरा समाचार….?
जगमड़वा जलाशय, पर्यावरण और जल सुरक्षा पर संकट की आशंका जताई, अनुशंसा निरस्त करने की मांग
सहसपुर लोहारा/कवर्धा। केशदा-इकनामा-चेलिकमा क्षेत्र को लौह अयस्क खनन हेतु आरक्षित किए जाने के प्रस्ताव का विरोध अब तेज होने लगा है। सहसपुर लोहारा रियासत के राजा खड़गराज सिंह ने जिला कलेक्टर कबीरधाम को आवेदन सौंपकर खनन क्षेत्र को MMDR अधिनियम की धारा 17(A) के अंतर्गत आरक्षित किए जाने संबंधी प्रशासनिक अनुशंसा को तत्काल निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित क्षेत्र केवल खनिज संपदा का भंडार नहीं, बल्कि जिले की महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर और भविष्य की जल सुरक्षा का आधार है।

कलेक्टर को दिए गए आवेदन में राजा खड़गराज सिंह ने कहा है कि केशदा-इकनामा-चेलिकमा क्षेत्र घने वनों, प्राकृतिक पहाड़ियों, जल स्रोतों तथा समृद्ध जैव विविधता से परिपूर्ण है। यहां अनेक प्रकार के वन्यजीव, पक्षी एवं अन्य जीव-जंतु प्राकृतिक रूप से निवास करते हैं। यदि क्षेत्र में खनन गतिविधियां प्रारंभ होती हैं तो बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई, धूल एवं ध्वनि प्रदूषण तथा भारी वाहनों की आवाजाही से संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।


जगमड़वा जलाशय पर पड़ सकता है प्रतिकूल प्रभाव
आवेदन में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि प्रस्तावित खनन क्षेत्र के नीचे जगमड़वा जलाशय का निर्माण किया जा रहा है। इस जलाशय से भविष्य में सहसपुर लोहारा नगर, बानो क्षेत्र सहित आसपास के कई गांवों को पेयजल एवं सिंचाई जल उपलब्ध कराया जाना प्रस्तावित है। इसे क्षेत्र की दीर्घकालिक जल सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण परियोजना बताया गया है।
राजा खड़गराज सिंह ने आशंका जताई है कि खनन गतिविधियों के कारण जलाशय का जलग्रहण क्षेत्र प्रभावित होगा, जिससे वर्षा जल का प्राकृतिक संचयन कम हो सकता है। साथ ही खनन से निकलने वाली मिट्टी और अवसाद (सिल्ट) जलाशय की भंडारण क्षमता को भी प्रभावित कर सकते हैं, जिससे भविष्य में जल उपलब्धता पर गंभीर असर पड़ने की संभावना है।

भूजल स्तर और पेयजल संकट को लेकर चिंता
आवेदन में कहा गया है कि लोहारा क्षेत्र पहले से ही गिरते भूजल स्तर और ग्रीष्मकालीन पेयजल संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। हर वर्ष गर्मी के मौसम में अनेक गांवों एवं नगर क्षेत्रों में जल संकट की स्थिति निर्मित होती है। ऐसे में पहाड़ियों, वनों और जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि खनन गतिविधियों के कारण भूजल पुनर्भरण (ग्राउंड वाटर रिचार्ज) की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है, जिससे आने वाले वर्षों में जल संकट और अधिक गंभीर रूप धारण कर सकता है। इसलिए किसी भी खनन गतिविधि को अनुमति देने से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाना जरूरी है।
ग्रामीणों और पशुपालकों की आजीविका पर भी खतरा
राजा खड़गराज सिंह ने आवेदन में यह भी उल्लेख किया है कि यदि प्रस्तावित खनन क्षेत्र में चारागाह, निस्तारी या अन्य सामुदायिक उपयोग की भूमि शामिल है, तो इससे स्थानीय ग्रामीणों और पशुपालकों की आजीविका प्रभावित होगी। सामुदायिक संसाधनों के नुकसान से ग्रामीण जीवन और पारंपरिक आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि पर्यावरणीय संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के हितों को ध्यान में रखते हुए किसी भी खनन गतिविधि पर अत्यंत सावधानीपूर्वक विचार किया जाए।
जनसुनवाई और व्यापक परामर्श की मांग
आवेदन में यह भी कहा गया है कि इतने महत्वपूर्ण निर्णय से पूर्व प्रभावित ग्राम पंचायतों, स्थानीय निकायों और आम नागरिकों से व्यापक परामर्श किया जाना चाहिए। स्थानीय जनता की राय और आपत्तियों को महत्व दिए बिना आगे बढ़ना जनभावनाओं के विपरीत होगा।
राजा खड़गराज सिंह ने कलेक्टर से चार प्रमुख मांगें रखी हैं, जिनमें 8 जून 2026 की अनुशंसा को तत्काल निरस्त करना, प्रस्तावित खनन क्षेत्र एवं जगमड़वा जलाशय के जलग्रहण क्षेत्र पर स्वतंत्र वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय अध्ययन कराना, भूजल, पेयजल, वन्यजीव और जैव विविधता पर संभावित प्रभावों का विस्तृत मूल्यांकन कराना तथा अंतिम निर्णय से पूर्व प्रभावित ग्राम पंचायतों और नागरिकों की जनसुनवाई आयोजित करना शामिल है।
जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की अपील
अपने आवेदन के अंत में राजा खड़गराज सिंह ने विश्वास व्यक्त किया है कि जिला प्रशासन अल्पकालिक खनन हितों की अपेक्षा क्षेत्र की दीर्घकालिक जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा। आवेदन की प्रतिलिपि विधायक कवर्धा एवं जल संसाधन विभाग, जिला कबीरधाम को भी प्रेषित की गई है।
क्षेत्र में प्रस्तावित लौह अयस्क खनन को लेकर उठे इस विरोध ने अब पर्यावरण संरक्षण, जल सुरक्षा और स्थानीय जनभावनाओं के मुद्दे को प्रमुखता से सामने ला दिया है। आने वाले दिनों में प्रशासन इस मामले में क्या निर्णय लेता है, इस पर क्षेत्रवासियों की नजर बनी हुई है।


