वन अधिकार पट्टा वितरण में देरी पर विधायक भावना बोहरा का सदन में ध्यानाकर्षण, मंत्री ने कहा– लंबित मामलों की होगी पुनः जांच…
पंडरिया। भावना बोहरा ने विधानसभा में वनांचल क्षेत्रों के आदिवासी, बैगा समुदाय एवं ग्रामीण किसानों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाते हुए वन अधिकार पट्टा वितरण में हो रही देरी का मामला सदन के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि पट्टा वितरण में विलंब के कारण हजारों किसान आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं तथा उन्हें शासन की कई योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है।
सदन में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से विधायक बोहरा ने बताया कि वन अधिकार पट्टा न मिलने के कारण वनांचल क्षेत्रों के किसान अपनी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं बेच पा रहे हैं और कई योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने इस विषय में विस्तृत आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह केवल एक जिले का नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के वनवासी और ग्रामीण किसानों के हित से जुड़ा गंभीर विषय है।
चर्चा के दौरान आदिम जाति विकास मंत्री रामविचार नेताम ने आश्वासन देते हुए कहा कि प्रदेश में वन अधिकार पट्टा से संबंधित जितने भी प्रकरण लंबित हैं, उनकी पुनः जांच की जाएगी। साथ ही पट्टा वितरण की प्रक्रिया को तेज कर पात्र हितग्राहियों को समय पर अधिकार दिलाने के लिए आवश्यक त्रुटियों को जल्द दूर किया जाएगा।

विधायक बोहरा ने सदन में कहा कि यदि जंगलों में पीढ़ियों से रहने वाले लोग अपनी ही जमीन के मालिक नहीं बन पाते, तो वन अधिकार कानून का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। जिन लोगों ने वर्षों से जंगलों की रक्षा की है, आज वही अपने अधिकार के लिए भटक रहे हैं। उन्होंने कहा कि वन अधिकार पट्टा केवल जमीन का कागज नहीं बल्कि आदिवासी समाज के सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक है।
उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध आंकड़ों का उल्लेख करते हुए बताया कि वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आवंटित कुल वन क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की हिस्सेदारी देश में सर्वाधिक लगभग 43 प्रतिशत है। प्रदेश में अब तक लगभग 5.05 लाख से अधिक वन अधिकार पट्टा वितरित किए जा चुके हैं, जो करीब 97.63 लाख एकड़ भूमि को कवर करते हैं। मई 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार राज्य के 30 जिलों में 4.82 लाख व्यक्तिगत और 4396 सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पट्टा वितरित किए गए हैं।
इसके बावजूद प्रदेश में 8.56 लाख से अधिक व्यक्तिगत वन अधिकार दावे प्राप्त हुए, जिनमें से लगभग 4.62 लाख यानी करीब 52 प्रतिशत दावों को विभिन्न कारणों से अस्वीकृत या निरस्त कर दिया गया है। विधायक बोहरा ने कहा कि इन दावों के निरस्त होने के पीछे कई प्रशासनिक और तकनीकी कारण भी जिम्मेदार हैं।
उन्होंने बताया कि अधिनियम के अनुसार 13 सितंबर 2005 से पहले 75 वर्षों के निवास का रिकॉर्ड प्रस्तुत करना आवश्यक होता है, लेकिन अधिकांश आदिवासी परिवार इतने पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पाते। इसके अलावा ग्राम सभा और प्रशासन के बीच समन्वय की कमी, तकनीकी और भौगोलिक बाधाएं, डिजिटलीकरण की धीमी प्रक्रिया तथा वन और राजस्व विभाग के बीच स्वामित्व संबंधी संशय भी प्रमुख कारण हैं।
जिले के संदर्भ में उन्होंने बताया कि कबीरधाम में लगभग 10,519 आवेदन केवल इसलिए निरस्त कर दिए गए क्योंकि आवेदकों के पास 13 दिसंबर 2005 के पूर्व कब्जे का पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं था। वहीं पंडरिया विधानसभा क्षेत्र में कुल 1817 आवेदनों में से 216 आवेदन दस्तावेजों की कमी के कारण निरस्त किए गए, जबकि पात्र 1601 लाभार्थियों में से भी कई को अब तक पट्टा वितरण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है।
उन्होंने कहा कि भूमि स्वामी के रूप में पंजीयन न होने के कारण किसानों को फसल बीमा, डीबीटी आधारित कृषि योजनाएं और इनपुट सब्सिडी का लाभ नहीं मिल पा रहा है। कई वनवासी परिवार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान बेचने से भी वंचित हैं और उन्हें निजी व्यापारियों को कम कीमत पर अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
विधायक बोहरा ने सरकार से यह भी पूछा कि राज्य में अब तक कितने वन अधिकार पट्टा आवेदन प्राप्त हुए, कितने स्वीकृत, कितने निरस्त और कितने लंबित हैं। साथ ही उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या निरस्त किए गए आवेदनों की पुनः समीक्षा के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा और लंबित मामलों के निराकरण के लिए कोई समय सीमा तय की जाएगी।
उन्होंने कहा कि वनांचल में निवासरत आदिवासी, विशेष रूप से बैगा जनजाति और ग्रामीण किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए इस समस्या का शीघ्र समाधान आवश्यक है। मंत्री ने सदन में आश्वस्त किया कि सभी लंबित मामलों की समीक्षा कर पात्र परिवारों को उनका वन अधिकार पट्टा दिलाने की दिशा में शीघ्र कार्रवाई की जाएगी।

